बचाव या जब्ती के बाद जंगल लौटे पैंगोलिन ने भोजन कहाँ खोजा और कौन-सी मांद अपनाई? मध्यप्रदेश वन विभाग और Wildlife Conservation Trust ने ऐसे सवालों को समझने के लिए 2019 में रेडियो टैग वाली परियोजना शुरू की। भारतीय पैंगोलिन की आवाजाही का संकेत मिलते रहने से शोधकर्ता उसकी रिहाई के बाद भी निगरानी कर सके।

2022 की प्रगति रिपोर्ट तक आठ पैंगोलिन टैग किए गए थे: दो सतपुड़ा और छह पेंच टाइगर रिजर्व के व्यापक जंगलों में। इनमें छह जीव बचाव या जब्ती के बाद पुनर्वासित किए गए थे। रिपोर्ट लिखे जाने के समय सात की निगरानी चल रही थी। एक सतपुड़ा टैग कोविड लॉकडाउन के दौरान काम करना बंद कर गया; यात्रा पाबंदियों से उसके बाद ट्रैकिंग नहीं हो सकी। यह उपकरण और निगरानी का दर्ज परिणाम है, उस जीव की मृत्यु का प्रमाण नहीं।

कठोर शल्क पर लगा छोटा संकेतक

परियोजना विवरण के अनुसार स्वास्थ्य जाँच के बाद रेडियो ट्रांसमीटर और GPS उपकरण दो अलग कठोर, निष्क्रिय शल्कों पर बिना सर्जरी लगाए गए। शुरुआती दो हफ्ते निगरानी सघन रखी गई, ताकि स्वास्थ्य और आवाजाही में समस्या जल्दी दिखे। बाद में संकेतों से दैनिक गतिविधि और ठहरने की जगह समझी गई। बरसात में भू-आकृति बदलने और रेडियो संकेत कमजोर पड़ने से ट्रैकिंग कठिन हुई—मैदानी विज्ञान की यह सीमा रिपोर्ट साफ दर्ज करती है।

मांद खोजने में कैमरा और खोजी कुत्ते

टैग वाले पैंगोलिन जिन मांदों का इस्तेमाल करते थे, वहाँ कैमरा ट्रैप लगाए गए। इससे अलग वन प्रकारों में मांद पर लौटने और गतिविधि का रिकॉर्ड बना। घने, ऊबड़-खाबड़ जंगल में मांद ढूँढने के लिए प्रशिक्षित खोजी कुत्तों की भी मदद ली गई। वे सक्रिय मांद, भोजन के लिए खोदी जगह और मल के निशान खोजते थे; फिर चुने स्थानों पर कैमरे लगाए जाते थे।

यह आठ जीवों पर आधारित परियोजना का ऐतिहासिक विवरण है। इससे पूरे राज्य की पैंगोलिन आबादी का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, लेकिन पुनर्वास की प्रक्रिया समझ में आती है। रिहाई के बाद के संकेत बताते हैं कि जीव नए क्षेत्र में कहाँ ठहरता है और किन आवासों का इस्तेमाल करता है। इसी जानकारी से अगली रिहाई और निगरानी के तरीके बेहतर बनाए जा सकते हैं।

मुख्य बातें

  • मध्यप्रदेश वन विभाग और Wildlife Conservation Trust की परियोजना 2019 में शुरू हुई।
  • 2022 की रिपोर्ट तक आठ पैंगोलिन रेडियो-टैग किए गए और छह बचाए/जब्त पैंगोलिन पुनर्वासित किए गए थे।
  • रिपोर्ट उस समय की प्रगति बताती है; इससे आज हर टैग या जानवर की स्थिति निष्कर्षित नहीं की जा सकती।

स्रोत और संदर्भ

  1. Wildlife Conservation Trust / Madhya Pradesh Forest Department · Developing an Ecology-based Conservation Strategy for the Indian Pangolin — Project Report (2022) ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
  2. IUCN Contributions for Nature / Wildlife Conservation Trust · Developing an ecology-based conservation strategy for the Indian Pangolin ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं

सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 15 सितंबर 2026।

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